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रामेश्वरम की यात्रा के

                              रामेश्वरम की यात्रा के 

 

 

यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार  का द्वीप है। बहुत पहले यह द्वीप भारत की मुख्य भूमि के साथ जुड़ा हुआ था, परन्तु बाद में सागर की लहरों ने इसे चारों ओर पानी से घेर कर टापू बना दिया जिसे जर्मन इंजीनियरों द्वारा बनाए गए लगभग 2 किलोमीटर लंबे पुल से मुख्य भूमि से जोड़ा गया है ।

यह पुल पहले बीच में से जहाजों के निकलने के लिए खुला करता था। अब तो इस पुल के समानांतर पुल पर सड़क मार्ग भी स्थित है

यहां के मंदिर का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है| रामेश्वरम् का मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है |मंदिर में सैंकडों विशाल स्तम्भ हैं जिन पर अनेक प्रकार की मूर्तियां गढ़ी गयी हैं |ज्योतिर्लिंग के सामने विशाल नंदी स्थित है जिस से पूर्व एक भव्य स्वर्ण स्तम्भ है | कथा के अनुसार श्री राम द्वारा रावण के वध किये जाने से उन्हें ब्रह्महत्या का पाप लग गया। इस पाप को धोने के लिए उन्होने रामेश्वरम् में शिवलिंग  की स्थापना करने का निश्चय किया। यह निश्चय करने के बाद श्रीराम ने हनुमान को आज्ञा दी कि काशी जाकर वहां से एक शिवलिंग ले आओ। हनुमान बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े। शिवलिंग की स्थापना की नियत घड़ी पास आ गई। हनुमान का कहीं पता न था। जब सीताजी ने देखा कि हनुमान के लौटने मे देर हो रही है, तो उन्होने समुद्र के किनारे के रेत को मुट्ठी में बांधकर एक शिवलिंग बना दिया। यह देखकर राम बहुत प्रसन्न हुए और नियत समय पर इसी शिवलिंग की स्थापना कर दी। छोटे आकार का शिवलिंग रामनाथ कहलाता है।बाद में हनुमान के आने पर पहले प्रतिष्ठित छोटे शिवलिंग के पास ही राम ने काले पत्थर के उस बड़े शिवलिंग को स्थापित कर दिया। ये दोनों शिवलिंग इस तीर्थ के मुख्य मंदिर में आज भी पूजित हैं। यही मुख्य शिवलिंग ज्योतिर्लिंग है | मंदिर की विशाल परिक्रमा में भी अनेक दर्शनीय मंदिर व मूर्तियां स्थित हैं |


  धनुषकोटि बीच

 यहाँ से दूर बीन के द्वारा श्री लंका देख सकते हैं | यहाँ विभीषण का मंदिर है | कहते हैं यहीं पर विभीषण ने श्री राम की शरण ली थी |

कन्या कुमारी का सूर्योदय

मंदिर में प्रवेश से पूर्व पुरुषों को अपने सभी उपरी भाग के वस्त्र उतारने पड़ते हैं | कैमरा ले जाना वर्जित है | दक्षिण के सभी मंदिरों की निर्माण शैली लगभग एक जैसी है |

 विवेकानंद स्मारक


इसी स्थान पर स्वामी विवेकानंद ने साधना की थी । इस स्थान को श्रीपद पराई के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस स्थान पर कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। कहा जाता है कि यहां कुमारी देवी के पैरों के निशान मुद्रित हैं। इस स्मारक के विवेकानंद मंडपम और श्रीपद मंडपम नामक दो प्रमुख हिस्से हैं। | स्मारक के पास ही एक अन्य चट्टान पर मूर्ती स्थापना का कार्य चल रहा है जो तमिल के एक प्रसिद्ध कवि तिरुवल्लुवर की है | 38 फीट ऊंचे आधार पर बनी यह प्रतिमा 95 फीट की है। इस प्रतिमा की कुल उंचाई 133 फीट है और इसका वजन 2000 टन है। इस प्रतिमा को बनाने में कुल 1283 पत्थर के टुकड़ों का उपयोग किया गया था। |बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का हिंद महासागर में मिलन का बड़ा अद्भुत दृश्य है | कन्याकुमारी में सागर की लहरें बड़ी तेजी से उछलती हुई आती हैं जब की रामेश्वर में समुद्र शांत था | समुद्र से प्राप्त होने वाले पदार्थों का अच्छा बाजार कन्याकुमारी में है 

|मीनाक्षी मंदिर

देवी मीनाक्षी को समर्पित यह मीनाक्षी मंदिर मदुरै की पहचान है। यह देश के प्रमुख शक्ति पीठों में से एक है। यहां प्रतिवर्ष हजारों की संख्‍या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। यह मंदिर लगभग 65 हजार वर्ग मीटर में फैला हुआ है | इसका निर्माण 16 वीं शताब्दी में किया गया था। मंदिर परिसर का सबसे प्रमुख आकर्षण हजार स्तंभों वाला कक्ष है जो सबसे बाहर की ओर स्थित है। दर्शन का समय सुबह 5 बजे से दोपहर 1:30 बजे तथा
शाम को 4 बजे से रात 9:30 बजे तक है | मदिर इतना विशाल,विस्तृत और भव्य है कि उसे देखने के लिए पूरा दिन चाहिए |
तिरुमलई पैलेस   
                                                                          अब इसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग करता है और इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जा चुका है। शाम को यहां ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जिसमें रोशनी और ध्वनि के माध्यम से राजा के जीवन और उनके मदुरै में शासन के बार में बताया जाता है।
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