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‘13 साल की उम्र से संघर्ष और अब ढाई घंटे में कमाती हूं ढाई लाख’



 प्रिया एक मोटिवेशनल ट्रेनर, स्पीकर और राइटर हैं। 13 साल की थीं, जब चंडीगढ़ छोड़ मुंबई बस गईं। हर एक फील्ड में आगे थीं। लोगों को पढ़ाने-समझाने में उन्हें मजा आता था। बस इसी शौक को उन्होंने अपना करियर बना लिया। 24 की उम्र में खुद की कंपनी लॉन्च करने वाली प्रिया आज बड़ी-बड़ी कंपनियों के कर्मियों को प्रेरित करती हैं। पिछले दिनों अपनी तीसरी किताब ‘द परफेक्ट वल्र्ड’ की लॉन्चिंग के लिए जब वह शहर आईं तो उन्होंने बताया कि मोटिवेशनल ट्रेनिंग में है कमाऊ करियर।

आंखों में सपने पाले एक स्कूली बच्चे के लिए मोटिवेशनल ट्रेनर दिलचस्प करियर साउंड करता है। इसमें करियर बनाने के लिए क्या करना होगा? आपकी अंग्रेजी बहुत अच्छी होनी चाहिए। स्पीकिंग एक्सेंट न्यूट्रल होना चाहिए। ऐसे शब्द इस्तेमाल करें जो सीधे असर करें। नॉलेज बहुत जरूरी है। इसके लिए फिलॉस्फी से लेकर ल्रिटेचर तक हर तरह की किताबें पढ़नी चाहिए। करेंट अफेयर्स से भी खुद को अपडेट रखना चाहिए। कई बार बेमतलब के सवाल भी किए जाते हैं। उनका जवाब देने के लिए नॉलेज और कॉन्फिडेंस होना बहुत जरूरी है। ये सारी खूबियां तो एक प्रफेसर या थिंकर में भी हो सकती हैं? हां, लेकिन दूसरों को मोटिवेट करने के लिए उसे खुद भी मोटिवेटेड होना चाहिए। ‘मैं नहीं कर सका तो आप करें’ वाला एटीट्यूड नहीं चलेगा। एक मोटिवेटर को अपने फील्ड में सफल होना चाहिए। नंबर वन से कम तो कुछ नहीं चलेगा। इसके अलावा, लोगों से प्यार करने वाला हो, उसे दोस्त बनाने का शौक हो, चुप न बैठता हो।ये तो गुण हो गए। प्रफेशनल लाइफ में कैसे एंट्री हो? ये गुण अनिवार्य समझिए। उसके बाद प्रफेशनल लेवल पर शुरू कर सकते हैं। शुरुआत छोटे लेवल से ही होती है। कॉलेज और क्लबों में अकसर मोटिवेशनल स्पीकर को बुलाते रहते हैं। ऐसी जगहों से अनुभव कमाएं, फिर बड़े लेवल पर खुद को लॉन्च करें।


आप कितना चार्ज करती हैं? दो-ढाई घंटों के लिए ढाई लाख रुपए।
10-15 साल पहले मोटिवेशनल स्पीकर नाम की चीज नहीं थी। इस बीच ऐसा क्या हुआ कि जिन लोगों ने इसे करियर बनाया, वे एक दिन में ही लाखों कमाने लगे? स्ट्रेस हो गया है लोगों की लाइफ में। काम करने के घंटे बढ़ गए हैं। पैसे कमाने की होड़ लगी है। हमने टेक्नीक को इतना बड़ा बना दिया है कि लोग जिंदादिली भूल गए हैं। मैं जब ट्रेनिंग शुरू करती हूं तो लोगों के मोबाइल अलग रखवा लेती हूं।

 
सुना है आप ट्रेनिंग के असामान्य तरीके अपनाती हैं?
मैं लोगों को आग और कांच पर चलवाती हूं। पहले वे मानने को तैयार नहीं होते कि वे ऐसा कर पाएंगे। लेकिन जब ऐसा कर लेते हैं, तो उनका खुद में विश्वास जगता है। एक पॉजिटिव एनर्जी मिलती है। नेगेटिविटी सिर्फ एक नजरिया है। कांच पर आराम से चलने के बाद लोगों को लगता है कि उस पार भी कुछ है।

स्टील रॉड मोड़ने को भी कहती हैं? हाहाहा। जी। वह भी गले से। यकीन मानिए ऐसा करके लोग बिल्कुल अलग महसूस करते हैं।

एक मोटिवेशनल स्पीकर के लिए कहां-कहां मौके हैं? आजकल हर कंपनी में ऐसी ट्रेनिंग कराई जाती है। बल्कि इसके लिए अलग से बजट रखा जाता है। कॉरपोरेट्स के अलावा सरकारी विभागों और कॉलेजों में भी इसकी जरूरत रहती है। पैसा भी अच्छा है। आपने कुछ बॉलीवुड हस्तियों को भी ट्रेन किया है? कई को किया है। पर सबके नाम नहीं बता सकती। उनके साथ एक कॉन्फिडेंशियल कॉन्ट्रैक्ट साइन करना पड़ता है। ज्यादातर को यह सिखाया कि असफलता के दौर से कैसे बाहर निकला जाता है।

 
ट्रेनिंग के वक्त एप्रोच क्या हो? सबसे पहला मकसद लोगों को इंगेज करना होता है। फिर लोगों को समझौता न करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। समझौता करना सबसे खतरनाक क्रिया है। मैं कभी ब्रूस ली जैसे घिसे-पिटे उदाहरण नहीं देती। किताब पढ़कर दूसरों के उदाहरण देने से अच्छा है कि आप अपनी लाइफ के उदाहरण दें।

 
आपकी तीसरी किताब आई है। आप भाषा में परफेक्शन की बात करती हैं। तो आप बेहतर ट्रेनर हैं, स्पीकर हैं या लेखक हैं? बेहतर लेखक हूं। यह मेरी लाइफ का वह पहलू है जिसे मैंने डिस्कवर किया।

 
तो फुल प्लेज राइटर क्यों नहीं बन जातीं? राइटर को पैसे नहीं मिलते ना। आप यह किताब खरीदेंगे तो मुझे सिर्फ 19 रुपए मिलेंगे। इससे अच्छा आप मुझसे 19 रुपए ले लो और किताब पढ़ो।
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